जरुरी क्यों है जीवन मे शील.....❔❔❔


जरुरी क्यों है जीवन मे शील.....❔❔❔

वर्तमान युग की युवा पीढ़ी 'दूसरे की थाली में घी हि घी दिखना' वाली कहावत को चरितार्थ करती हुई भारतीय पद्धति को छोड़कर हर कार्य पाश्चात्य पद्धति से करने की भ्रामक धारणा में तत्पर है। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा के कारण पाश्चात्य पद्धति से किया गया हर कार्य भारतीय परंपराओं से प्रतिकूल होने से जीवन के विकास के लिए नहीं, अपितु विनाश के लिए होता है। उसका प्रतिफल तत्काल नहीं दिखाई पड़े, लेकिन कुछ महीनों अथवा कुछ वर्षों में अवश्य अनुभव में आता है।

आज देश के कोने-कोने में व्यभिचार, भ्रष्टाचार और आतंकवाद दिखाई दे रहे हैं। भोगों को बढ़ावा देने वाले टीवी, मोबाइल फोन्स, कंप्यूटर, लैपटॉप के माध्यम से अश्लील वीडियो और अश्लील उपन्यास आदि के द्वारा कामोत्तेजक प्रवृत्तियों, खाने, न-खानेयोग्य पदार्थो के विवेक से रहित नाना व्यंजनों को खाने-खिलाने की प्रेरणा दी जा रही है। फल स्वरुप विश्व में आज सदाचार और संयमित आचरण करने वाले व्यक्तियों का मिलना अत्यंत दुष्कर हो गया है। सीता, सावित्री, अंजना, राम, लक्ष्मण, छत्रपती शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप आदि महान आत्माओं जैसा व्यक्तित्व ढूंढने पर भी आज देखने में नहीं आ रहा; अतः भगवंतों, आचार्यों, मनीषियों द्वारा बताई गई शील की महिमा को समझकर, अनुपम शीलरत्न को धारण करके एवं अपनी शक्ती अनुसार इस विषय को प्रचारित-प्रसारित करके अपनी सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को पुनः जीवंत रूप देकर जीवन को कृतार्थ करने का समय आ गया है।

इसके संदर्भ में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का निम्नोक्त कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि, "आध्यात्मिक काम विज्ञान की जानकारी हमें सर्वसाधारण तक पहुंचानी ही चाहिए। सृष्टि के इतने महत्वपूर्ण विषय को जिस की जानकारी प्रकृति जीव-जंतुओं तक को करा देती है। उसे गोपनीय नहीं रखा जाना चाहिए, खासतौर से तब जब इस महत्वपूर्ण विज्ञान का स्वरूप लगभग पूरी तरह से विकृत और उल्टा हो गया हो। जो मान्यताएं चल रही है, वही चलने दी जाए, सुलझे हुए समाधान व सुरुचिपूर्ण प्रावधान यदि प्रस्तुत न किए गए तो विकृतियाॅ ही बढ़ती पनपती चली जाएगी, और उससे मानवजाति एक महती शक्ति का दुरुपयोग करके अपना सर्वनाश ही करती रहेगी। समय आ गया कि काम-विद्या के तत्वज्ञान का संयत और विज्ञानसम्मत प्रतिपादन करने का साहस किया जाए और संकोच का यह पर्दा उठा दिया जाए कि इस महान विद्या की विवेचना हर स्तर पर अश्लील ही मानी जाएगी, उसे हर स्तर पर गोपनीय ही रखा जाना चाहिए। यह संकोच मानव जाति को एक महान लाभ से वंचित ही रखे रहेगा।"

सांप्रत युग में ज्ञान के साधनों का विस्तार तो खूब हुआ है। परंतु पांच इंद्रियों के विषयभूत स्पर्श, रस, गंध, वर्ण एवं शब्दों की मादकता मन पर छाई हुई होने से ज्ञान नहीं हो रहा। कदाचित् ज्ञान होता भी है, तो धारणा तक नहीं पहुंच पाता, बुद्धि की ऊपरी सतह को स्पर्श कर विलय को प्राप्त हो जाता है। आचार्य कुंदकुंददेव कहते है कि -

"ताव ण जाणदि णाणं विसयबलो जाव वट्टए जीवो।" (अष्टपाहूड)


जब तक यह जीव विषयों के वशीभूत रहता है; तब तक ज्ञान प्राप्त नहीं करता है। यदा कदाचित् महत्पुरुषार्थ एवं महाभाग्य से ज्ञान प्राप्त भी कर ले तो उस कोरे ज्ञान से, शुष्कज्ञान से भावों में निर्मलता, विशुद्धि नहीं आती है, मन पवित्र नहीं होता है। भावों में निर्मलता , विशुद्धि, मन की पवित्रता तो शील से ही आती है; नहीं तो दशपूर्व को जानने वाले रुद्र के भावों में विशुद्धि क्यों नहीं आई ? विषयलोलुपी ज्ञानसहित दशपूर्व को जानने वाला रुद्र शीलगुण के अभाव में मुनिपद/साधुपद से भ्रष्ट होकर नरक में क्यों गया ? इससे स्पष्ट होता है कि 'कामातुराणां न भयं न लज्जा।' स्पर्श सुख के लंपटी जीव का विवेक खो चुका होता है। समय-असमय, कुल-शील, रिश्ते-नाते, धर्म-कर्म इनका विवेक क्षण में नष्ट कर अपने आध्यात्मिक गुण समुदाय को माटी मोल करने वाला यह वडवानल व्यक्ति को निरंतर जलाता जाता है।विषय वासनाओं से आसक्तचित्त मनुष्य का कौन सा गुण नष्ट नहीं होता है ? अर्थात् मनुष्यता, विद्वत्ता, आभिजात्यता आदि सभी गुण नष्ट होते हैं।

विषयासक्तचित्तानां गुणा को वा न नश्यति।
न मानुष्यं न वैदुष्यं, नाभिजात्यं गुणान्भाक्॥ (क्षत्रचूडामणि)






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ENGLISH TRANSLATION:

The young generation of the present era is quick to mislead in the misleading notion of doing every work in the Western method except in the Indian method, to refer to the adage 'Ghee ghee is seen in another's plate'. Due to the dignity of matter, area, time, sentiment, every work done by Western method is not for the development of life but for destruction due to being adverse to Indian traditions. His reward may not be visible immediately, but it is definitely experienced in a few months or a few years.

Today , adultery, corruption and terrorism are visible in every corner of the country. Through televisions, mobile phones, computers, laptops that promote indulgence, porn videos and pornographic novels, etc., are being encouraged to feed a variety of aphrodisiac trends, non-edible food items without discretion. As a result, in the world today , it has become very difficult to meet people who behave ethically and moderately. Even finding great personalities like Sita, Savitri, Anjana, Rama, Laxman, Chhatrapati Shivaji Maharaj, Maharana Pratap etc. are not seen today; Therefore, it is time to gratify life by realizing the glory of modesty told by Bhagwantas, Acharyas, mystics, wearing Anupam Sheelaratna and re-circulating their civilization, culture and history by propagating the subject according to their power. is.

In this context, the following statement of Pandit Shri Ram Sharma Acharya is very important. He says, "We must make the knowledge of spiritual work science accessible to the general public. Such an important subject of creation, which nature makes known to the animals and animals. It should not be kept confidential, especially when this important The nature of science has become almost completely distorted and inverted. Let the beliefs that are going on, be allowed to run, if there are solutions and elegant provisions. If not designed, the perversions will continue to flourish, and by that mankind will continue to do its own apocalypse by abusing a great power. The curtain should be lifted that the deliberations of this great discipline will be considered obscene at every level, it should be kept confidential at every level. Han benefits will continue to be denied."

In the Sampraat era, the means of knowledge has expanded considerably. But the five senses do not get knowledge due to the subjective touch, juices, smells, colors and the drunkenness of words. Perhaps even if there is knowledge, it is unable to reach the perception, merging is achieved by touching the upper surface of the intellect. Acharya Kundakundadeva says that, "Taavana jaanadi nana visayabalo jav vatta jeevo." As long as this organism is subject to subjects; Till then one does not acquire knowledge. Sometimes even if you get knowledge from the great man and great fortune, then with that Koregyan, arid knowledge, there is no cleanness, purity in the emotions, the mind is not pure. In feelings, purity, purity, purity of mind comes only from modesty; Otherwise, why did the wisdom of Rudra, who knew the Deccan, not come into purification? Why did Rudra, who knows the pre-determined wisdom with a subjective knowledge, go to hell, corrupted by munipad / sadupada, in the absence of piety? It is clear that 'Kamaturananam nor Bhajan nor shame'. The lustful creature of tactile pleasure has lost its conscience. Time-untimely, clairvoyant, relationship-being, religion-work destroy their conscience in the moment and burn their spiritual virtues to the community, and burn this person continuously.

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