कुशील से कैसे बचें ???


जो व्यक्ति कामुक विचार रखते हैं; कामवर्धक साहित्य पढ़ते हैं; कामुक फिल्में देखते हैं; कामुक फोटो, मूर्तियां और एल्बम देखते हैं; वे कामोत्तेजित होने पर कामुकता से प्रभावित होकर उसे शांत करने के लिए कुशील के घृणित और गंदे कार्य को करके वीर्यपात कर लेते हैं।

विविध ग्रंथों में विविध शीर्षकांतर्गत कुशील से बचने, सुशील अपनाने और उसमें स्थिर रहने के लिए कई मर्यादाओं का पालन बताया; जिनमें से कुछ निम्न प्रकार है।

1.शरीर को अनावश्यक रूप से सजाना-संवारना नहीं चाहिए। वेश का प्रभाव तन तथा मन दोनों पर पड़ता है। इसलिए सादे, साफ और सूती वस्त्रों को पहनकर सेंट परफ्यूम आदि से दूर रहना चाहिए।

2.'जैसा खाए अन्न वैसा बने मन' अत्यधिक भोजन, इष्ट रसों का अधिक सेवन, गरिष्ठ/भारी भोजन करने से बचना चाहिए। रसीली, चिकनी चीजों - दूध, दही, तेल, गुड, मिठाई आदि को अधिक मात्रा में ग्रहण नहीं करना चाहिए। ऐसे भोजन से विषय वासना को शीघ्र उत्तेजना मिलती है; वीर्य वृद्धि होती है। बासी, सड़ा हुआ, लाल मिर्च, खटाई, लहसुन, प्याज और तिरस्कार पूर्वक दिए गए अन्न का सेवन न करें । मांसाहार ना करें । भोजन शुद्ध व सात्विक, ताजा, सादा और इमानदारी से खरीदे गए पैसों का हो

3. अश्लील गीत संगीत एवं नृत्य सिनेमा ना सुने ना देखें। आज जितने भी सिनेमा भारत में रिलीज हो रहे हैं ; उनमें कामुकता का विष भारी मात्रा में भरा पड़ा है।



4. स्त्री -संसर्ग से दूर रहे , ऐसे सभी प्रसंग टाले, जिनमें स्त्रियों से परिचय होता हो और बार-बार बातचीत करने का मौका आता हो। अपना समय अधिकतर सत्संग में लगाए, स्वाध्याय में लगाए।

5.स्त्री में किसी प्रकार का संकल्प या विचार न करें। स्त्री अंगो को बार-बार देखने कि इच्छा ना करके ऐसे स्थानों से बचे। उनके हाव-भाव और कटाक्षो को न देखे।

6.प्रत्येक स्त्री और पुरुष को चाहिए कि वह एक दूसरे में ऐसी धारणा करें कि यह शरीर बहुत अपवित्र वस्तुओं से बना है। इसमे मल, मूत्र ,अस्थि, चर्म ,रुधिर जैसी सर्वथा अशुद्ध वस्तुऐं है।



7.पान ,मसाला ,गुटखा, सिगरेट, शराब, चरस, अफीम, भांग ये चीजें धातु क्षीण करती है। इसलिए इन व्यसनों से दूर रहे।

8. पूर्व में भोगे हुए भोगों का स्मरण न करें ; नहीं उसमें आनंद मानकर उसकी चर्चा करें। वासना को बढ़ाने वाली स्त्री संबंधी बातें छोड़नी चाहिए। पिछले जीवन में स्त्रियों के साथ जो भोग भोगे हो , जो हंसी मस्करी की हो, ताश खेली हो , उनके शरीर का स्पर्श किया हो, उनके मान मर्दन के लिए गर्व किया हो, जो विनोद किया हो उसका मन में विचार तक न करें।

9. आगामी भोग भोगने की चिंता ना करें।।

10.शुक्र का क्षरण न करें ।

11. स्त्री द्वारा संसक्त/ प्रयोग की गई शय्या, आसन अथवा कोमल आसन का प्रयोग भी ना करें।

12. रात्रि में एकाकी न घूमे ।

13. लिंग में विकार होने की संभावना में उस स्थान से हट जाए।

14. स्त्री का वस्त्र आदि से सत्कार ना करें एवं सत्कार करने में आदर भाव ना माने ।

15.दूसरों के शादी-ब्याह के कार्य में अति हर्षित ना होवे।

16. व्यभिचारी स्त्री के यहां आना -जाना ना करें।

17. काम सेवन के निश्चित अंगों को छोड़ शेष अंगों द्वारा काम सेवन कहीं अनुभव में आए ; तो वहां से हट जाए ।

18. काम सेवन की तीव्र अभिलाषा ना रखे ।

19. स्त्रियों में राग / प्रेम को पैदा करने वाली कथा- कहानियों को सुनने का त्याग करें ।

20. हंसी मजाक में पुरुष को स्त्री का रूप बनाकर मन वचन काया से कुशील कि प्रवृत्ती न स्वयं करें न दूसरों से करावें।

21.नित्य आसन, प्राणायाम, योगाभ्यास, व्यायाम करें। सवेरे - शाम खुली शुद्धवायु का सेवन करें ।


22.रात्रि में जल्दी सोकर सवेरे ब्रह्म मुहूर्त में उठें। सोने से पहले पेशाब कर, हाथ पैर धोकर शरीर कि तथा भगवान के स्मरण द्वारा मन की शुद्धि कर सोए। प्रातः जल्दी उठे। वीर्यपात प्रायः रात के अंतिम प्रहर में होता है ।

और इन सब बातों में सबसे मुख्य बात है। शील-रक्षा तन से अधिक मन पर आधारित है। इसलिए मन को नियंत्रण में रखें और अपने सामने ऊंचे आदर्श रखें।

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