कुशील के दुष्परिणाम/ हानियाॅ




👉 कुशील सेवन की इच्छा करने वाले पुरुष की दशा 

1. स्त्री विषयक चिंता करता है।
2. स्त्री को देखने की तीव्र इच्छा।
3. निश्वास डालता है - स्त्री के नहीं मिलने पर मानसिक तनाव में जाकर आर्तध्यान करता है।
4. ज्वर आना।
5. दाह उत्पन्न होना।
6. भोजन आदि में अरुचि होती है।
7. बेहोशी - स्त्री के वियोग में हिताहित के विचार रहित होकर बेहोश/ मदहोश हो जाता है।
8.पागलपन - उन्मत्त, पागल (शराब पिए हुए मनुष्य के समान) कुत्सित वाक्य बोलता है।
9. मरे हुए के समान हो जाता है।
10. मरण - मनोरथ पूर्ति न होते देख मरण को प्राप्त हो जाता है। आज इस वासना के वश होकर सैकड़ों कन्याएं एवं नवयुवक रेल के नीचे कटकर , कुएं में गिरकर , सल्फास की गोली खाकर, फांसी लगाकर आत्महत्या कर रहे हैं ; क्योंकि अश्लीलता के इस माहौल में कामोत्तेजक गानो, उपन्यासों, वीडियो को देख-सुनकर उनकी वासनाएं उद्दीप्त होती है । फिर लड़कियां लड़कों को एवं लड़के लड़कियों को छेड़ते हैं।

मात्र किसी स्त्री या बालिका के साथ सेवन का विचार करने से ही इतनी व्यथा सहनी पड़ती है तो जो साक्षात कुशील - सेवन करते हैं उनकी क्या दशा होती है उसे स्वयं विचार कर ले।

👉मैथुन से होने वाली हानियां :

1.शारीरिक हानि
2.धार्मिक हानी
3.सामाजिक हानि
 4.आर्थिक हानि

1. शारीरिक हानि -

शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से आयुर्वेद में तो महीने में 1 बार से अधिक भोग का निषेध किया है; क्योंकि भोजन से उत्पन्न शारीरिक शक्ति में से वीर्य की उत्पत्ति सबसे अंत में होती है। वह वीर्य 40 किलो अर्थात आधा क्विंटल भोजन करने पर डेढ़ तोला बनता है। यह मूर्ख प्राणी एक बार के विषय सेवन से महीनों के किए गए भोजन से उत्पन्न वीर्य को नष्ट कर देता है। अधिक काम सेवन करने से टीबी, कुष्ठरोग, नपुंसकता आदि भयंकर रोग हो जाते हैं। जो अपनी पत्नी में भी अति करता है उसे आयुर्वेद चेतावनी देता है - "अति स्त्री प्रसंग वाले को शूल , खासी, बुखार, श्वास रोग , दुबलापन , पांडुरोग, क्षयरोग, ऐंठन आदि व्याधियाॅ घेर लेती है।"

जो भौतिकवादी विलासप्रिय अमेरिका आदि देश शील का मखौल उड़ाते थे वे भी आज एड्स रोग के कारण शील को महत्व देने लगे हैं ।



जो काम संत महात्मा नहीं कर पाए, वह 'एड्स ' की बीमारी फैलाने वाले एक निहायत शुद्र जीव ने कर दिखाया । आज फिर से पश्चिमी स्कूलों में नैतिकता की दुहाई दी जा रही है।

2. धार्मिक हानि -

 कुशील सेवन से अनेक जीवो कि हिंसा होती है । शास्त्रों में इस प्रकरण को बताते हुए लिखा है -

"मैथुनाचरणे मूढः , म्रियते जन्तुकोटयः ।
योनिरन्ध्रसमुत्पन्नाः ,लिंगसंघट्टापीडितः ॥"


अरे मूर्ख प्राणी ! स्त्री के पास मैथुन करने में उसके योनि रूप छिद्र में उत्पन्न हुए करोड़ों जीव लिंग के आघात से पीड़ित होकर मरते हैं। 'धाए धाए असंखेज्जा' अर्थात लिंग के प्रत्येक आघात में असंख्यात करोड़ जीव मरते हैं।

मेडिकल शोध में सिद्ध हुआ है कि 25 बूंद वीर्य में 60 मिलीयन (6 करोड) से 110 मिलीयन तक सूक्ष्म जीव रहते हैं। वैज्ञानिकों ने स्वयं सूक्ष्म दर्शक यंत्र से वीर्य में जीवोको चलते-फिरते देखा है।

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माता का रज एसिड (आम्ल) गुण युक्त होता है पिता का वीर्य ऐलक्लाइन (क्षार) गुण युक्त होता है । संभोग में रज एवं वीर्य का संयोग होने पर, एसिड एवं ऐलक्लाइन का रासायनिक मिश्रण होने के कारण जो रासायनिक प्रक्रिया होती है; उससे उन जीवो का मरण हो जाता है ।

मनुष्य के खून में सफेद और लाल जीवाणु (पेशीयाॅ) होते हैं सफेद जीवाणुओं में रोगों के कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति होती है। वीर्य जितना पुष्ट व अधिक होता है, ये जीवाणु उतने ही शुभ्र ,रोग निरोधक और स्फूर्ति दायक होते हैं। 'शुक्रक्षयात् प्राणक्षयः' की युक्ति के अनुसार जब शुक्र का नाश होता है तो प्राणों का भी नाश हो जाता है। धातु दौर्बल्य , प्रमेह, मधुमेह, पक्षाघात, ग्रंथिवात ,सन्निपात ,अपस्मार, हृदयगतिरोध और मानसिक विक्षिप्तता जैसे कई रोग वीर्यपाती को घेरे रहते हैं। इसप्रकार हि सामाजिक एवं आर्थिक हानि को जानना।

जिस व्यक्ती को स्वयं का हित करना हो उसे कुशील का सर्वथा त्याग करना चाहिये; क्योंकी आचार्य कहते है कि 'यह संयम रुपी वृक्ष को तोडने के लिए धारदार कुल्हाडि के समान है -

निरवशेष यम द्रुमखण्डने;
शितकुठार हतिर्ननु मैथुनम्॥
सततमात्महितं शुभमिच्छता ;
परिहृतिर्विधिनास्य विधीयते॥(श्री पद्मनंदिपंचविंशतिका)


स्थिति को बदला तभी जा सकता है जब जीवन में शील की पुनः प्रतिष्ठा हो।

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