शीलरक्षा के अष्टसूत्र


1.सत्संकल्प
'मन एवं मनुष्याणां, कारणं बंध मोक्षयोः।' मनुष्य का मन ही उसके बंधन एवं मोक्ष में कारण है। मन को वश में करने वाला शरीर और इंद्रियों की गुलामी नहीं करता और जो मन के वश में रहता है वह शरीर और इंद्रियों के साथ-साथ पूरी दुनिया की गुलामी करता है। जिसने मन के दूर्विचारों को जीता वही सबसे बड़ा विजेता है। इसलिए मन को सत्संकल्पो में लगाकर उसका दृढ़ता पूर्वक पालन करना चाहिए। संकल्प शक्ति से कोई भी कार्य असंभव नहीं रहता।

2. सत्संगति
ब्रह्मचर्य धारण और धर्म संरक्षण में ही क्यों ? जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संगति का अत्यंत महत्त्व है।

'सत्संगत्वे निसंगत्वं , निःसंगत्वे निर्मोहत्वम् ।
निर्मोहत्वे निश्चलत्वं , निःश्चलत्वे जीवनमुक्तः ॥ʼ


अर्थात सत्संगति से निसंगता (नाॅन-अटैचमेंट) की प्राप्ति होती है, निःसंगत्व से निर्मोहता बढ़ती है , अर्थात विषय भोगों से आसक्ति घटती है , निर्मोहत्व से सत्यज्ञान, निश्चलता होती है और निश्चलता से यह मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।

'को न कुसंगति पाई नसाई।ʼ अर्थात ऐसा कौन है जो कुसंगति पाकर नष्ट नहीं हो जाता, गलत मार्ग पर नहीं चला जाता। 'जैसी संगत, वैसी रंगत' होती है।

3.स्वाध्याय
जैन आचार्यों ने कहा है- 'स्वाध्यायः परमं तपः।' स्वाध्याय परम तप है। हम जिसप्रकार का साहित्य पढ़ते हैं, वैसे ही हमारे भाव बन जाते हैं। हम पुस्तक पढ़ते पढ़ते उसमें ही बह जाते हैं । अतः साहित्य पढ़ने की आदत डालनी चाहिए।

4.अनुप्रेक्षा चिंतन
आचार्य उमास्वामी ने तत्वार्थ सूत्र में कहा है 'जगत्काय स्वभावौ वा संवेग वैराग्यार्थं।' संवेग के लिए संसार तथा वैराग्य के लिए शरीर के स्वभाव का चिंतन करना चाहिए। जो जीव संसार की अनित्यता , संबंधों की विचित्रता का चिंतन करता है, वह संसार से भयभीत हो उठता है और अपने आत्मा की सुध लेता है। इसी प्रकार जो शरीर के घृणित स्वभाव का चिंतन करता है; उसे वैराग्य हो जाता है और वह साधना का पथ अंगिकार करता है।
शीलवान पुरुष अपनी उम्र से अधिक की स्त्रियों को माता समान , हमउम्रवाली को बहिन और कम उम्र वाली को पुत्रीतुल्य मानता , समझता है। कहा भी है -

'आत्मवत् सर्वभूतेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् ।
मातृवत् परदारेषु , यः जानाति सः पण्डितः॥'


जो पुरुष सभी जीवो को अपनी आत्मा के समान, पर धन को पत्थर के समान और परस्त्रियों को माता के समान देखता है, वह पंडित है।

5. निरंतर कार्यशीलता
एक अच्छे व्यक्ति को निरंतर कार्यशील रहना चाहिए। जो व्यक्ति निरंतर कार्यशील रहते हैं, उनकी निरंतर उन्नति होती है। व्यक्तित्व निखरता है, सम्मान बढ़ता है, प्रतिभा विकसित होती है।
जो लोग समय की कीमत नहीं करते समय भी उनकी कीमत नहीं करता है।

6. दैनिक पुस्तिका लेखन
हमें प्रतिदिन का लेखा-जोखा रात्रि में बैठकर अपने दैनिक पुस्तिका में लिखना चाहिए। लिखना चाहिए कि सुबह से अब तक कितने अच्छे कार्य किए और कितने बुरे ? कितने लोगों को दुख दिया और कितनों को सुख ? कितनो के साथ अच्छा व्यवहार किया और कितनों के साथ बुरा ? कितनी गलतियां दिन भर में हुई है तथा कितनी अच्छाईयां ? आदि-आदि क्रियाओं का रोकड मिलान की तरह लेखा-जोखा करें। जो बात डायरी में लिखने की न हो, किसी से कहने की न हो और मन में सालती हो उसे एक कागज पर लिखे और फाड़कर फेंक दे, मन का गुबार निकल जाएगा और मन हल्का हो जाएगा।

7. व्यायाम, योगासन, प्राणायाम
यदि हम केवल 5 वर्ष तक वीर्य संरक्षण के साथ व्यायाम करें तो कोई भी अब्रह्मचारी हमउम्र व्यक्ति शारीरिक बल में पराजित नहीं कर सकता। अतः नित्य-प्रति व्यायाम, योगासन, प्राणायाम करें।

8.ध्यान-चिंतन
'खाली मन शैतान का घर।' अगर मनको थोड़ी देर भी न संभाला जाए तो वह 1 सेकंड में लाखों-करोड़ों किलोमीटर तक भाग जाता है, किसी कार्य में लग जाता है।अतः जीवन में समय-समय पर ध्यान चिंतन भी जरुरी है।

उपरोक्त आठ सुत्रों कि निरंतरता जीवन में बने रहने पर व्यक्ति शीलसंपन्न हि नही तो सर्वगुणसंपन्न हो जाता है।


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ENGLISH TRANSLATION:

Ashtasutra of Shilaraksha

1. Resolution
'Mind and human beings, because of the reasons of salvation.' Man's mind is the reason in his bondage and salvation. The one who tames the mind does not slavery to the body and the senses, and the one who lives under the mind slaves the body and the senses as well as the whole world. Whoever wins the thoughts of the mind is the biggest winner. Therefore, by putting the mind in satsankalpo, it should be strictly followed. No action is impossible with willpower.

2. Discourse
Why only in celibacy and protection of religion? Consistency is of great importance in every sphere of life.

'Satsangatve Nisangatvam, Nisangatve Nirmohatvam.
Immaculate elements, free lives

That is, satsangati leads to disinterest (non-attachment), disinterestedness leads to detachment, that is, attachment to the subject enjoyments decreases, unrestrainedness leads to satyagya, unrestrainedness and of course this human life becomes free.

'Ko na kusangati pi nasai' It is 'consistent, like color'.

3.Swadhyay
Jain Acharyas have said- 'Swadhyaya: Paramantha Tapah'. Swadhyaya is the ultimate austerity. The kind of literature we read becomes our expressions in the same way. When we read a book, we get carried away by it. Therefore, you should get into the habit of reading literature.

4. Awaiting Reflection
Acharya Umaswamy has said in the metaphysical sutra, 'Jagatkaya nature, or impetuous vairagyartham.' One should think about the nature of the body for sentiment and body for quietness. The person who contemplates the impermanence of the world, the strangeness of relations, becomes afraid of the world and takes care of his soul. Similarly one who contemplates the abominable nature of the body; He becomes disinterested and he embraces the path of cultivation.
Urbane man considers women older than his age as his mother, we consider Umarwali as sister and younger age as daughter. Where is it too?

‘Atmanvat Sarvabhuteshu Paradravishu Loshtavat.
Matravat Pardareeshu, ie Janati Saspandit: 4 '

A man who sees all living beings as his own soul, but wealth as a stone and the parasites like a mother, is a priest.

5. Continuous functionality
A good person should be constantly working. The people who are constantly working, constantly grow. Personality grows, respect grows, talent develops.
Those who do not value time also do not value them.

6. Daily Book Writing
We should sit in our daily book by sitting at night and sitting in our daily book. Write down how many good things have been done since morning and how bad? How many people hurt and how many people got happiness? How well were you treated and bad with how many? How many mistakes have happened in the day and how many goodies? Perform audits like cash matching of adi-adi verbs. Whatever is not to be written in the diary, is not to say to anyone, and if you have a year in your mind, write it on a paper and tear it away and the mind will go out and the mind will become lighter.

7. Exercise, Yogasana, Pranayama
If we only exercise with semen protection for 5 years, then no non-orthodox human age can defeat us in physical force. Therefore, do regular exercises, yoga, pranayama.

8. Meditation
'Empty mind is Satan's house.' If the mind is not handled for a while, then it runs for millions of kilometers in 1 second, gets engaged in some work, so meditation is also necessary in life from time to time.

If the continuation of the above eight sutras continues in life, a person becomes humble, if not humble.

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