वीर्य रक्षा, जीवन सुरक्षा


मनुष्य और वृक्ष में नैसर्गिक समानता है, इसलिए शास्त्रों में वीर्य को मनुष्य का मूलाधार (जड़,मूल) और बुद्धि को सहस्त्रार (शिखर, शाखाए, डालियाॅ) माना गया है। जड़ के माध्यम से शिखर को आवश्यक भोजन मिलता है। जिससे क्रमशः फूल, फल और बीज लगते हैं और वृक्ष को निश्चित सफलता मिलती है। इसी प्रकार मूलाधार शुक्राणु से हारमोंस बनते हैं। जिससे हमारी बुद्धि, भावनाएं और विचार प्रक्रिया चलती है। विचारों के अनुसार ही हम क्रमशः योजना, कार्य और परिणाम को प्राप्त होते हैं। इसलिए मनुष्य को मूलाधार तत्व वीर्य की रक्षा करनी चाहिये।

वीर्य उत्पत्ती की प्रक्रिया बड़ी जटिल और समय खाने वाली है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है -

"रसाद्रक्तमं ततो मांसं , मासान्मेदः प्रवर्तते।
मेदोस्थितः ततो मज्जं , मज्जाच्छुक्रं ततो प्रजा॥"

मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह प्रथम पेट में जाकर पचने लगता है ; तथा पचकर उसमें से रस बनता है। उस रस का पाचन होकर रक्त बनता है। रक्त से मांस, मांस से मेदा, मेदा से हड्डी, हड्डी से मज्जा, मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है। पुरुष के उस शुक्र को 'वीर्य' तथा स्त्री के शुक्र को 'रज' कहते हैं। इस वीर्य और रज का कभी पाचन नहीं होता। सातो धातुए क्रम से एक दूसरे के रूप में परिणमन करती रहती है ; तथा उनमें से बचा हुआ व्यर्थ का पदार्थ मल, मूत्र, पसीना, आंख-कान-नाक के मैल, नाखून तथा केशादि के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है।

भोजन से रस, रस से रक्त आदि रूप में परिणमन में प्रत्येक धातु को 4 दिन तथा 2 दिन के सातवें भाग प्रमाण काल/समय लगता है। इस प्रकार निरंतर परिणमन करते हुए भी इन धातुओं का कभी अभाव नहीं होता।

सप्त धातुओं में से सारभूत पदार्थ 'वीर्य' तथा 'रज' होता है। यह 'वीर्य' और 'रज' शरीर में 'औजस' (कान्ति,प्रभा) रूप में चमकता रहता है। जिसके शरीर में सप्तम सारभूत 'वीर्य' या 'रज' कम हो जाता है , वह मनुष्य भले ही शरीर से हट्टा-कट्टा दिखता हो ; लेकिन वह ओज , कान्ति  से रहित होता है।

यदि किसी का प्रश्न हो कि कितने भोजन से कितने वीर्य की उत्पत्ति होती है ? इस प्रश्न के विषय में आज के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का विचार है कि - "40 किलो खुराक से 1 किलो रक्त बनता है तथा 1 किलो रक्त से 25 ग्राम वीर्य बनता है। यदि एक स्वस्थ मनुष्य 1 किलो खुराक रोज खाता है ; तो 40 किलो खाने में उसे 40 दिन लगेंगे। उस 40 दिन के भोजन से मात्र 25 ग्राम वीर्य उसको प्राप्त होगा तथा 30 दिन में 20 ग्राम वीर्य बनेगा। उस सारभूत तेज-कांति देने वाले तथा शक्ति के आधारभूत 20 ग्राम वीर्य को एक बार के भोग में नष्ट कर देना कितनी मूर्खता है ? जीवन का घोर पतन है। ऐसा करने वाला पुरुष उस मूर्ख बागबान के समान है ; जो तन मन धन से दिन-रात परिश्रम करके फूलों के सुंदर बगीचे को तैयार करता है तथा सैकड़ों फूलों का इत्र निकलवा कर उसे मोरी में डाल देता है अथवा डलवा देता है।

वीर्य की एक बूंद भी निकलना मानो अपने शरीर को नींबू की तरह निचोड़ डालना है। वीर्योत्पत्ति को हम निम्नलिखित चार्ट के माध्यम से समझ सकते हैं -


ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। उनमें कुछ इसप्रकार है -
1.मानसिक उल्लास
2.बुद्धि की तीव्रता
3.सहनशीलता
4.आत्मनिर्भरता
5.बंधन से मुक्ति
6.अद्भुत शक्ति की अभिव्यक्ति
7. शारीरिक पुष्टता
8. सौन्दर्यवृद्धि

ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले में सदैव मानसिक उल्लास तथा स्फुर्स्ती बनी रहती है। उसका मनोबल (will power) इतना दृढ होता है कि आपत्तियों के वज्र गिरने पर भी कमजोर नहीं हो सकता। असफलताओं में भी उसके मुख पर मुस्कुराहट बनी रहती है।

शतावधान और सहस्रावधान के प्रयोग ब्रह्मचर्य से ही सिद्ध होते हैं। आचार्य अकलंकदेव प्रत्येक बात को एक बार सुनकर ही याद(कंठस्थ) कर लेते थे। वह शक्ति उन्हें ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही प्राप्त हुई थी। ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले की स्मरणशक्ति बहुत तीव्र होती है।

"किं बहुना लिखितेन , संक्षेपादिदमुच्यते।
त्यागो विषयमात्रस्य , कर्तव्योऽखिलैः मुमुक्षुभिः॥"

मुमुक्षु जीव के कल्याण के लिए कितना लिखे ? सब कल्याणकारी ग्रंथो का सार संक्षेप में बताना हो तो यही होगा कि - " मुमुक्षुओ को इंद्रिय विषयों का त्याग करना चाहिए।"

"शील रतन सबसे बड़ो , सब रत्नों की खान।
तीन लोक की संपदा , रही शील में आन॥"


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ENGLISH TRANSLATION:


There is a natural similarity between man and tree, so in the scriptures, semen has been considered as man's base (root, root) and intellect as sahastrar (peak, branches, branches).  Shikhar gets the necessary food through the root.  Due to which flowers, fruits and seeds are planted and the tree gets definite success.  Similarly, hormones are formed from muladhara sperm.  Through which our intelligence, emotions and thought process goes on.  According to the ideas, we get the plan, action and result respectively.  Therefore, it is our duty to protect man's base element semen.

 The process of semen production is very complex and time consuming.  It is mentioned in the scriptures -

 "Rasadraktam tato meat, masanamedah pravartate.
 Medostha Tato Mjjj, Mjjachchukranto Tato Praja "

 Whatever food a man eats, he gets digested in the first stomach;  And after digestion, juice is made from it.  Blood is formed by digestion of that juice.  Blood is produced from flesh, flesh to meat, flour to bone, bone to marrow, marrow to Venus.  The male's Venus is called semen and the female Venus is called Raja.  There is never digestion of this semen and raj.  These seven metals continue to interchange each other in sequence;  And the remaining waste material comes out of the body in the form of feces, urine, sweat, dirt from the eyes, ears and nose, nails and hair.

 Each metal takes 4 days and the seventh part of 2 days proof time / time in the form of juice from food, blood from juice etc.  In this way, even after continuous refinement, these metals are never lacking.

 Among the seven metals, the essential substance is 'semen' and 'raja'.  This 'semen' and 'raja' keeps shining in the body in the form 'aujas' (kanti, prabha).  The person whose seventh essence 'semen' or 'raja' is reduced, even if the person looks ridiculous from the body;  But it is devoid of.

 If anyone has a question as to how much food, how much semen is produced?  Regarding this question, today's scientists and doctors think that - "1 kg of blood is produced from 40 kg of food and 25 kg of semen is produced from 1 kg of blood. If a healthy person eats 1 kg of food daily, then 40 kg  It will take him 40 days to eat. He will get only 25 grams of semen from that 40 days of food and 20 grams of semen will be made in 30 days. 20 grams of semen, which gives a strong radian and strength, once  How foolish it is to destroy in the enjoyment of life? There is a great downfall of life. A man doing this is like a foolish gardener who works diligently day and night to prepare a beautiful garden of flowers and perfume of hundreds of flowers.  Removes it and puts it into a sluice.

 Even a drop of semen is like squeezing your body like a lemon.  We can understand semen through the following chart -

By following Brahmacharya, man has many benefits.  Some of them are mentioned below -
 2. Intensity of intelligence
 3. Tolerance
 4. Self-reliance
 5. Freedom from bondage
 6.Expression of wonderful power
 7. Physical fitness
 8. Beauty

 In those who follow Brahmacharya, there is always mental euphoria and spontaneity.  His morale (will power) is so strong that even if objections fall, it cannot be weakened.  Even in failures, a smile remains on his face.

 Experiments of copulation and Sahasravadhana are proved by celibacy.  Acharya Akalankadev used to memorize (memorize) each thing only once.  He got that power only through the influence of celibacy.  The memory of a person who follows Brahmacharya is very strong.

 "That Bahuna Likhten, Junkpadidmuchite.
 Lose subject matter, duties, play: Mumukshubhi: 4 "

 How much should Mumukshu write for the welfare of the creature?  If you want to summarize the essence of all the welfare texts, then it will be that - "All the Mumukshuas should abandon the senses."

 "Sheel Ratan Bado Bado, mine of all jewels.
 The wealth of three people, in the form of honor.

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