शील कि मिसाल, छत्रपती शिवाजी-महाराजा छत्रसाल


एक बार शिवाजी महाराज के एक सेनापति रण में विजय प्राप्त करने के पश्चात एक यवन कन्या को अपने साथ ले आये, ताकि वह उसे शिवाजी महाराज को एक अनुपम भेंट देकर प्रसन्न कर सकें।

वह शिवाजी महाराज के सम्मुख उपस्थित हुआ और बोला- "महाराज! हमने किला जीतकर यवनों को भगा दिया है।

"तुम वीर हो, तुमसे ऐसी ही अपेक्षा थी।" शिवाजी बोले।

"महाराज! इस विजय की खुशी में हम आपके लिए उपहार लाये हैं।" सेनापति बोला।

(यह भी पढे - मूर्ती पूजा का रहस्य।)

"कैसा उपहार सेनापति?"

"महाराज! यह है उपहार।" यवन कन्या को उपस्थित करते हुए सेनापति बोला।

प्रखर-बुद्धि शिवाजी महाराज उसकी कुचेष्टा को भाँप गये और तेवर बदलते हुए सेनापति से बोले - "अगर तूने रण में विजय प्राप्त नहीं की होती तो आज मैं तुम्हारी कुचेष्टा के कारण कठोर दंड देता। मेरी आँखों के सामने से हट जाओ। मुझे तुमसे ऐसी अपेक्षा न थी।"

दूसरे सेनापति को आदेश दिया कि यवन युवती को श्रृंगार कर महल में ले आओ। आदेशानुसार
सेनापति ने वैसा किया। युवती भय के कारण थरथरा रही थी।

शिवाजी महाराज कुछ समय तक उसकी ओर
निहारते रहे, फिर युवती से बोले-"देवी, काश! मेरी माता जी इतनी सुन्दर होती तो मैं भी इतना सुन्दर होता।
यवन बाला! डरो मत, तुम मेरी माता के समान हो । मेरी दृष्टि में प्रत्येक नारी नैसर्गिक रूप से माँ है, फिर मेरे देश की संस्कृति पराभूत को विवश नहीं करती।"

शिवाजी महाराज ने उस यवन बाला को उचित भेंट देकर ससम्मान उसके स्वजनों के पास पहुंचा दिया।

ऐसे सर्वोत्तम उदाहरण केवल भारतीयों में मिलते हैं।

शिक्षा - जीवन में चारित्र-बल ही सबसे बड़ा बल है। चारित्र की उज्ज्वलता से ही व्यक्ति महान बनता है।
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 महाराजा छत्रसाल ➡️


छत्रसाल सदाचारी, सत्यनिष्ठ एवं सहृदय प्रजा-वत्सल राजा थे। वे प्रायः प्रजा के सुख-दुख को देखने
के लिए कभी-कभी रूप परिवर्तित करके घूमते थे। संकटों में फंसे हुए दुखी एवं आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों के दुख दूर करने के लिए देखभाल करते और उन्हें हर तरह की सहायता देकर संकटों से उबारने का प्रयत्न करते थे।
गौर-वर्ण, बड़े-बड़े नेत्र, चौड़ा ललाट, दीर्घ बाहु, विशाल वक्षःस्थल, सुन्दर दिव्य, सुसंगठित, मझौला उनका
शरीर था। उनके शरीर-सौंदर्य पर एक स्त्री मोहित हो गई।

एक दिन जब उन्हें अपने दरवाजे के सामने से जाते हुए देखा तो सामने आकर कहने लगी- "मैं बहुत
दुखिया हूँ।"

महाराज ने सहजता से पूछा - "आपको क्या दुख है देवी जी?"

महाराज की दृष्टि नीचे थी। शांत नयन
सात्त्विक और गम्भीर चेहरा था।

उस नारी को छल करना था। कपट पूर्ण भौंहों को टेढ़ी करती हुई, इठलाती हुई बोली - "श्रीमान ! मेरा दुख दूर करना है तो पहले मुझे वचन दो। आपके बिना वह दुख दूर नहीं हो सकता। मैं आपसे वचन लेना चाहती हूँ। दोगे न?"

"सम्भव हुआ तो तुम्हारा दुख अवश्य दूर करूँगा !" महाराज ने कहा।

सहज चंचलता द्वारा अपनी आँख की भौंहें टेढ़ी करती हुई एवं कुचेष्टा करती हुई वह बोली- ''मुझे
सन्तान नहीं है। पुत्रोत्पत्ति में मेरे पति असमर्थ हैं । मैं आप जैसे पुत्र की कामना करती हूँ। वह आपसे ही संभव हो सकता है। मैं आपको अपना शरीर तक सौंपने को तैयार हूँ।"

वह निर्लज्जता पूर्वक बोल रही थी। उसकी विकार भावना स्पष्ट नजर आ रही थी।'

महाराजा छत्रसाल क्षण भर के लिए स्तब्ध होकर असमंजस में पड़ गये - किंकर्तव्यविमूढ हो गये,
किन्तु शीघ्र सँभल गये।

हाथ जोड़ कर बोले कि "आपको मेरे समान ही पुत्र चाहिए न? हे माता ! आज से यह छत्रसाल आपका पुत्र है।"

उस देवी के चरणों में गिरते हुए उन्होंने कहा। उस स्त्री की दुषित भावना भाग गई। विकार की जगह पवित्रता आ गई। उस दिन से उस स्त्री का वे राजमाता के समान सम्मान करते थे।

शिक्षा - सदाचारी पुरुष किसी भी परिस्थति में अपने नियम-संयम में दृढ़ रहते हैं। उनकी दृढ़ता से अन्य जनों को भी सदाचार की प्रेरणा मिलती है।
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ENGLISH TRANSLATION:

1. Chhatrapati Shivaji Maharaj

Once, one of Shivaji Maharaj's generals conquered Rana, he brought a young girl with him so that he could please her by giving him a unique gift to Shivaji Maharaj.

He appeared before Shivaji Maharaj and said- "Maharaj! We have driven away the Yavanas by winning the fort.

"You are brave, you expected the same." Shivaji said.

"Maharaj! In the joy of this victory, we have brought gifts for you." The commander said.

"What gift commander?"

"Your Majesty! This is a gift." Senapati said while presenting Yavana Kanya.

Sharp-witted Shivaji Maharaj understood his mischief and changed his mind, he said to the commander - "If you had not won in the battle, today I would have given harsh punishment because of your mischief. Get out of my eyes. Let me like you Was not expected. "

He ordered the second commander to bring the young woman to the palace. As ordered
The commander did that. The woman was trembling due to fear.

Shivaji Maharaj for a while
Behold, then said to the girl - "Goddess, I wish, my mother would have been so beautiful, I would have been so beautiful."
Young lady! Do not be afraid, you are like my mother. In my view, every woman is a natural mother, then the culture of my country does not compel the defeated. "

Shivaji Maharaj gave respectfully to that Yavan Bala and brought respect to his relatives.

The best such examples are found only in Indians.

Education - Charity-force is the biggest force in life. The person becomes great by the brightness of the character.

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2.Maharaja Chhatrasal ➡️

Chhatrasal was a virtuous, honest and noble people-king. They often see the happiness and sorrow of the people
For sometimes, the forms changed. He took care to alleviate the grief of the miserable and distressed people trapped in the crisis and tried to get out of the crisis by giving them all help.
Gaura-varna, big eyes, wide frontal, long arms, huge chest, beautiful celestial, well-organized, medium
Was the body. A woman was fascinated by his body-beauty.

One day when he saw them going in front of his door, he came in front and said- "I am very
I'm sad

  Maharaj instinctively asked - "What is wrong with you, Goddess?"

  Maharaj's vision was down. Cool nayan
There was a sattvic and serious face.

That woman had to cheat. The hypocrite said with a frown, crooked eyebrows - "Sir, if I want to get rid of my grief then promise me first. Without you that grief cannot be overcome. I want to promise you. Will you?"

"If possible, you will definitely get rid of your grief!" The king said.

She spontaneously crooked her eyebrows and said, "I am
Is not a child. My husband is unable to put up a son. I wish for a son like you. That can only be possible from you. I am ready to hand over my body to you. "

She was speaking shamelessly. His disorder feeling was clearly visible.

Maharaja Chhatrasal stunned for a moment and became confused - confused.
But got up soon.

With folded hands, he said, "You want a son like me, no? O mother! From today this Chhatrasal is your son."

  He said falling at the feet of that goddess. The woman's docile spirit fled. Purity came in place of disorder. From that day onwards, they respected her like a mother.

Education - Virtuous men stand firm in their rule under any circumstances. His perseverance also inspires morality to other people.

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