परहित सरस धर्म नहीं भाई



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बापू मद्रास में एक गाँव के रास्ते जा रहे थे। गांव
के किनारे एक औरत मैले-कुचैले कपड़े पहने सिर पर
घड़ा रखे मिली। गांधीजी को लगा कि इस महिला को
सफाई के विषय में बताया जाये।

उन्होंने उससे कहा, 'माँ! इन कपड़ों को धो लिया करो और रोज नहाते समय बदल लिया करो।'

गाँधीजी की बात सुनकर महिला मौन रही।।

गाँधीजी को आश्चर्य हुआ। बोले- "क्यों, मेरी बात बुरी
लगी?'

वह बोली, 'बात तो ठीक है। लेकिन मैं क्या
पहन कर नहाऊँ और क्या पहन कर धोऊँ।।

'क्या तुम्हारे पास और कपड़े हैं ही नहीं?'

महिला फिर मौन रही। गाँधीजी समझ गये कि उसके पास बदलने के लिए कपड़े हैं ही नहीं।

गाँधीजी ने उसी समय शपथ ली कि सारे
देशवासियों को जब तक तन-भर कपड़ा नहीं मिलता, तब तक वे भी केवल कौपीन धारण करके रहेंगे। तब से
आजीवन उन्होंने घुटनों तक की ही धोती पहनी अन्य कोई वस्त्र नहीं पहना। चाहे कड़कती सर्दी ही क्यों न पड रही हो। विदेश जाने पर भी वे अपने उन्हीं वस्त्रों में रहते थे ; जबकि वे यदि चाहते तो आराम की जिन्दगी बिता सकते थे।

शिक्षा - गाँधीजी के इसी दुर्लभ व्यक्तित्व ने उन्हें महान बनाया। करुणा-उदारता आदिगुण उनके जीवन में
प्रकट दिखते थे ; न कि केवल भाषणों में। श्रेष्ठ और उच्च आचरण से व्यक्ति महान बनता है।

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