ऐसे बढाएं रोग प्रतिरोधक क्षमता



कोरोना के इस दौर में अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने के अतिरिक्त फिलहाल दूसरा विकल्प नहीं है, ऐसे में इन तरिकों को अपनाकर अपनी immunity power बढाई जा सकती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को आयुर्वेद में 'व्याधिक्षम' कहते है। व्याधिक्षमत्व वह शक्ति है, जो व्याधि के बल को घटाती है और व्याधि की उत्पत्ति को रोकती है।व्याधिक्षमत्व आयुर्वेद का प्राचीन शब्द है, जिसे पाश्चात्य वैद्यक शास्त्र में 'इम्युनिटी' कहते है।

आयुर्वेदाचार्यों का कहना है कि स्वास्थ्य की रक्षा करना ही व्याधिक्षमत्व की वृद्धि करना है। रोग प्रतिरोधक क्षमता का तात्पर्य किसी रोग के निवारण में होने वाली सुगमता मात्र से नहीं है। मानव शरीर के विकास एवं किसी भी प्रकार की व्याधि को टालने में भी रोग प्रतिरोधक क्षमता का विशेष योग होता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय

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प्राकृतिक चिकित्सा में खानपान के ऐसे बहुत से उपाय बताए हैं जिनकी मदद से हम अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि कर सकते हैं। प्राकृतिक चिकित्सकों के अनुसार निम्न तरीकों से शरीर की प्रतिरोधकता को बढ़ाया जा सकता है।

शुद्धि क्रिया : जल नेति, सूत्र नेति, वस्त्र धौती,प्राणायाम, अनुलोम-विलोम,उज्जयी, शीतली, शीतकारी, भ्रामरी।

आसन : उत्तान पादासन, पवन मुक्तासन, कटिवक्रासन, सेतूबधासन, शलभासन, भुजंगासन, धनुरासन, पद्यासन, पर्वतासन, वक्रासन, वज्रासन, सिंहमुद्रा, जिह्वाबध, योगमुद्रा, ताड़ासन, अर्धचक्रासन, हस्तपादासन, त्रिकोणासन, वृक्षासन।


यह सभी योग क्रियाएं मनुष्य के आंतरिक अंगों को ऊर्जा प्रदान करती हैं। उन सभी अंगों के सुचारु संचालन को सुनिश्चित करती हैं। मांसपेशियों एवं शरीर के बाह्य भाग में विकसित संलिप्तता एवं सुदृढ़ता किसी भी प्रकार के बाह्य अवरोध के निराकरण में मदद करती है। नियमित योग अभ्यास न सिर्फ मानव की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है अपितु उसे दीर्घकाल के लिए सुनिश्चित करता है।

जल : जल रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का सबसे सस्ता एवं सर्वसुलभ साधन है। नियमित रूप से प्रचुर मात्रा में पिया गया स्वच्छ जल हमारे शरीर से कई तरह के विषैले तत्वों को बाहर निकालता है। जल को ठंडे, गरम, गुनगुने हर रूप में लिया जा सकता है। हां, फ्रिज के पानी से जरूर परहेज करना चाहिए।



फल : फल कोई भी हो शरीर की प्रतिरोधकता को बढ़ाते ही हैं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि फलों को साबुत ही खाएं। अगर ऐसा ना हो पाए तो फलों के जूस आदि का भी प्रयोग किया जा सकता है, मगर जूस में स्वाद के लिए नमक या चीनी मिलाना वर्जित है। हमेशा ताज़ा जूस ही पीएं, रखा हुआ क़तई नहीं।


गिरीदार मेवे : सर्दी के मौसम में गिरीदार फलों जैसे अखरोट आदि का सेवन फ़ायदेमंद होता है। इन्हें रात भर भिगोकर रखने व सुबह दूध के साथ, खाने से आधे घंटे पहले लेने से बहुत लाभ होता है।

अंकुरित अनाज : अंकुरित अनाज जैसे मूंग, मोठ, चना आदि तथा भीगी हुई दालों का भरपूर मात्रा में सेवन करें। अनाज को अंकुरित करने से उनमें उपस्थित पोषक तत्वों की क्षमता बढ़ जाती है। ये पचाने में आसान, पौष्टिक और स्वादिष्ट होते हैं।

सलाद : भोजन के साथ सलाद का उपयोग अधिक से अधिक करें। भोजन का पाचन पूर्ण रूप से हो, इसके लिए सलाद का सेवन ज़रूरी है। सलाद में मौसमी फलों व सब्जियों जैसे ककड़ी, टमाटर, मूली, गाजर, पत्तागोभी, प्याज, चुकंदर आदि का प्रयोग किया जा सकता है। इन सब्जियों आदि में प्राकृतिक रूप से मौजूद नमक ही हमारे लिए पर्याप्त होता है। इसलिए सलाद में ऊपर से नमक डालने से बचना चाहिए।


तुलसी : ऐसा नहीं कि तुलसी का केवल धार्मिक महत्व ही है। वो अपनी जगह है मगर इसके साथ ही यह ज़बर्दस्त एंटीबायोटिक, दर्द निवारक और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी फायदेमंद है। रोज सुबह तुलसी, विशेषकर श्यामा तुलसी के 3-5 पत्तों का नियमित सेवन करें।

गेहूं के ज्वारे का रस : गेहूं का ज्वारा अर्थात गेहूं के छोटे-छोटे पौधों की हरी-हरी पत्तियां जिनमें शुद्ध रक्त बनाने की अद्भुत शक्ति होती है, इसलिए ज्वारों के रस को ग्रीन ब्लड भी कहा जाता है। गेहूं के ज्वारे में पर्याप्त मात्रा में क्लोरोफिल एवं मैग्नीशियम पाया जाता है, जो शरीर में तेजी से रक्त बनाता है। इसीलिए इसे प्राकृतिक परमाणु की संज्ञा भी दी गई है। गेहूं घास के सेवन से कोष्ठबद्धता, एसिडिटी, गठिया, भगंदर, मधुमेह, बवासीर, खांसी, दमा, नेत्र रोग, म्यूकस, उच्चरक्तचाप, वायु विकार इत्यादि में भी अप्रत्याशित लाभ होता है। इसके रस के सेवन से अपार शारीरिक शक्ति की वृद्धि होती है।

प्रस्तुति : सुभाष बंसल
लेखक दैनिक भास्कर जयपुर में कार्यरत हैं।

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