अजीर्ण (Dyspersia) आयुर्वेदिक घरेलू उपचार


आयुर्वेद प्राचीन भारत की एक चिकित्सा पद्धति भर नहीं है, एक व्यापक आयुर्विज्ञान है। यहां औषधीय प्रयोगों की ऐसी विधियां खोजी गईं, जिनसे जीवन में सुख और उत्साह बढ़ाया जा सके। उसे रोगमुक्त बनाकर आनंदपूर्वक जिया जा सके। आर्यु शब्द का अर्थ है जीवन और मृत्यु के बीच का समय... आयुर्वेद हमें बताता है कि जीवन और मृत्यु के बीच के इस समय को कैसे जिया जाए। कैसे आत्मशक्ति, प्रकृति का सान्निध्य और थोड़ी-सी जागरूकता से अपने लिये सकारात्मक और स्वस्थ जीवन की राहें खोल दी जाएं...

👉 अजीर्ण (Dyspersia) आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

1.टमाटर को कुछ सेंककर सेंधा नमक और काली मिर्च (पिसी हुई) लगाकर खाने से अजीर्ण दूर होता है।

2.सोंठ, इलायची और दालचीनी प्रत्येक समान मात्रा में लेकर विधिवत कूट-पीसकर और छानकर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें। इस चूर्ण को भोजन से पहले 1 ग्राम की मात्रा में ताजे जल के साथ सेवन करने से अरुचि व मंदाग्नि दूर होती है।

3.भुना हुआ जीरा, भुनी हुई हींग, सोंठ और सेंधा नमक प्रत्येक समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार कर सुरक्षित रख लें। इस चूर्ण को 2-2 ग्राम की मात्रा में निरंतर कुछ दिनों तक भोजनोपरांत सेवन करने से अजीर्ण दूर होता है।

4.नारंगी का रस आवश्यकतानुसार लेकर उसमें थोड़ा-सा नमक और सोंठ का चूर्ण मिलाकर निरंतर कुछ दिनों तक सेवन करने से अजीर्ण दूर होता है तथा पाचनशक्ति बढ़ती है।

5.तुलसी के पत्तों का रस प्रतिदिन 10 ग्राम 2 चम्मच निरंतर कुछ दिनों तक सेवन करने से अजीर्ण का विकार दूर हो जाता है।

6.सूखे, खट्टे अनारदाने में सफ़ेद जीरा और काला नमक समान मात्रा में मिलाकर गर्म जल के साथ सेवन करने से अजीर्ण रोग नष्ट हो जाता है।

7.अदरक स्वरस 10 ग्राम, नींबू स्वरस 5 ग्राम और सौंचर नमक 1 ग्राम इन सभीको मिलाकर सेवन करने से अजीर्ण का कष्ट दूर हो जाता है। यदि इस प्रयोग को प्रतिदिन भोजन के बाद किया जाए तो अजीर्ण का कष्ट कभी नहीं होता है।

8.छोटी हरड़ को भूनकर काले नमक के साथ सेवन करने से अजीर्ण आदि विकार नष्ट हो जाते हैं।

9.बिल्व (बेल) के गूदे में शक्कर, सोंठ, काली मिर्च, जीरा, कपूर, इलायची मिलाकर तथा खूब घोट-छानकर सेवन करने से आंव दोष दूर होकर अरुचि दूर होती है।

10.आंवला, हरड़, बहेड़ा, अश्वगंधा, शतावरी और मुलहठी प्रत्येक समान मात्रा में लेकर विधिवत कूट-पीसकर व कपड़छन करके चूर्ण तैयार करके सुरक्षित रख लें। यह चूर्ण 2-3 ग्राम की मात्रा में शहद में मिलाकर प्रतिदिन 3 बार भोजन के 30 मिनट पूर्व सेवन करने से अग्निमांद्य में लाभ होता है।

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